Rakesh Asthana case Filing PIL become a business Central govt said in High Court NODBK – राकेश अस्थाना मामले पर सुनवाईः हाईकोर्ट से बोली केंद्र सरकार

नई दिल्ली. चर्चित आईपीएस अधिकारी राकेश अस्थाना (Rakesh Asthana) की दिल्ली पुलिस के आयुक्त पद पर नियुक्ति को चुनौती देने वाली याचिका पर आज केंद्र सरकार की ओर से दिल्ली हाईकोर्ट (Delhi High Court) में सख्त प्रतिक्रिया दी गई. केंद्र की तरफ से पेश वकीलों ने कहा, ‘कई लोगों के लिए जनहित याचिकाएं दायर करना एक कारोबार या करियर बन चुका है.’ गुजरात कैडर के वरिष्ठ आईपीएस राकेश अस्थाना से जुड़े इस मामले में केंद्र सरकार (Central Government) की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बहस की.

केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने मुख्य न्यायाधीश डीएन पटेल और न्यायमूर्ति ज्योति सिंह की खंडपीठ के समक्ष इस मामले में PIL दायर करने वालों पर तंज कसा. उन्होंने कहा, ‘पीआईएल एक उद्योग है, यहां तक कि करियर है, जिसकी कल्पना संविधान में नहीं की गई थी. कुछ लोग चाहते हैं कि वे सरकार चलाएं, लेकिन लोकतांत्रिक तरीके से इसमें सफल नहीं हो पाते हैं तो अपनी अधूरी इच्छाएं पीआईएल दायर करके पूरी करते हैं. वही लोग कहते रहते हैं कि यह नियुक्ति गलत है, वह नीति गलत है….’टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित एक खबर के अनुसार, मेहता ने कहा कि अस्थाना की नियुक्ति प्रक्रियाओं का पालन करते हुए की गई थी.

समीक्षा का कोई स्कोप नजर नहीं आता
उन्होंने कहा कि नियुक्ति करने का अधिकार सरकार के पास है और यदि प्रक्रिया का पालन किया गया है, तो उसकी न्यायिक समीक्षा का कोई स्कोप नजर नहीं आता. उन्होंने दावा किया, ‘यह तथ्य है कि यही प्रक्रिया इससे पहले भी आठ बार अपनाई गई थी और इस पर कभी सवाल नहीं उठे. यह मेरी इस दलील को स्वीकार करने के लिए पर्याप्त आधार है कि इस याचिका में जनहित के अलावा कुछ और मंशा है.’ अस्थाना की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने कहा कि याचिकाकर्ता किसी और की छद्म लड़ाई लड़ रहा है, जो सामने नहीं आना चाहता और उसका कोई पर्सनल इंटरेस्ट है.

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उल्लंघन है
केंद्र और अस्थाना दोनों ने ही सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन (CPIL) की हस्तक्षेप याचिका का विरोध किया. सीपीआईएल ने केंद्र के 27 जुलाई के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में पहले ही एक याचिका दायर की हुई है. सीपीआईएल की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने दावा किया कि नियुक्ति से पहले संघ लोक सेवा आयोग से संपर्क नहीं किया गया और यह सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उल्लंघन है.

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